1977 की महा-ब्लॉकबस्टर, अखबार की दर्दनाक खबर से आया आइडिया, मेकर्स ने घुमाकर बनाई फिल्म, वेस्टइंडीज तक दिखा जलवा
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1977 का साल हिंदी सिनेमा के लिए किसी 'रंगीन मुकाबले' से कम नहीं था, जहां हर हफ्ते बॉक्स ऑफिस पर कोई न कोई बड़ी फिल्म दर्शकों को अपनी ओर खींच रही थी. यह वह दौर था जब एक तरफ रोमांस और पारिवारिक भावनाओं वाली कहानियां थिएटरों में गूंज रही थीं तो दूसरी तरफ एक्शन, कॉमेडी और मसाला एंटरटेनमेंट ने भी दर्शकों को पूरी तरह बांध रखा था. इसी साल 'हम किसी से कम नहीं', 'धरम वीर', 'चाचा भतीजा', 'परवरिश' और 'अपनापन' जैसी फिल्मों ने सिनेमाघरों में जबरदस्त भीड़ जुटाई और स्टार पावर का जलवा दिखाया. लेकिन इसी चमक-दमक और हिट फिल्मों की भीड़ के बीच एक अलग तरह की सिनेमाई सोच भी जन्म ले रही थी. जहां कहानियां सिर्फ घटनाओं तक सीमित नहीं थीं, बल्कि उन्हें भावनाओं, कल्पना और बड़े पैमाने के मनोरंजन में ढाला जा रहा था. यही वह माहौल था जिसमें कुछ फिल्मों ने न सिर्फ टिकट खिड़की पर कमाल किया, बल्कि आने वाले दशकों के लिए 'मसाला सिनेमा' की परिभाषा ही बदल दी.
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