मनुष्य की पूर्णता तभी संभव है, जब वह इन दोनों दृष्टियों का संतुलित समन्वय स्थापित करे। बाहरी जगत का ज्ञान जीवन को सुविधाजनक बनाता है, जबकि आत्मज्ञान उसे अर्थ, दिशा और परम संतोष प्रदान करता है।
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