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    यूपी विधानसभा चुनाव 3 महीने पहले हो सकते हैं:जनगणना-बोर्ड परीक्षाएं वजह; भाजपा या सपा, किसे मिलेगा फायदा

    10 hours ago

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    8 जून, नई दिल्ली- INDIA ब्लॉक की दिल्ली में बैठक हुई। 25 राजनीतिक दल इसमें शामिल हुए। यूपी से सपा प्रमुख अखिलेश यादव शामिल हुए। कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने कहा- SIR और चुनाव की निष्पक्षता को लेकर CJI को लेटर लिखेंगे। 5 जून, नई दिल्ली- राहुल गांधी के साथ यूपी के प्रमुख दलित और अति पिछड़ा वर्ग के नेताओं की बैठक हुई। विधानसभा चुनाव से पहले यह सपा के 'PDA' फॉर्मूले को और मजबूत करने की कोशिश थी। 4 जून, लखनऊ- भाजपा के संगठन महामंत्री धर्मपाल सिंह ने कहा- यूपी विधानसभा चुनाव में पश्चिम बंगाल चुनाव मॉडल अपनाएंगे। 1.76 लाख बूथ पालक तेजी से नियुक्त कर लीजिए। यहां भाजपा के 98 संगठनात्मक जिलों के अध्यक्ष मौजूद थे। ये 3 संकेत इस बात को बढ़ावा दे रहे हैं कि यूपी में विधानसभा चुनाव तय समय से पहले हो सकते हैं। लखनऊ की ब्यूरोक्रेसी से जुड़े सोर्स राष्ट्रीय जनगणना को इसकी बड़ी वजह बता रहे हैं। दरअसल, चुनाव फरवरी में प्रस्तावित हैं। इसी महीने में जनगणना का दूसरा चरण भी शुरू हो रहा। इसके अलावा, बोर्ड परीक्षाएं भी हैं। ऐसे में ज्यादातर कर्मचारी ड्यूटी में लगे रहेंगे। ऐसे में संभावना जताई जा रही है कि चुनाव दिसंबर महीने के अंत या जनवरी के शुरुआती हफ्तों में हो सकता है। यानी 3 महीने पहले चुनाव हो सकते हैं। इस पर चुनाव आयोग के अधिकारी कहते हैं- वोटर लिस्ट का SIR कार्यक्रम जारी होना है। आमतौर पर फाइनल वोटर लिस्ट जनवरी के मध्य में आती है। अगर आयोग ने समय से पहले चुनाव का फैसला लिया, तो इस बार अंतिम वोटर लिस्ट नवंबर तक प्रकाशित कर दी जाएगी। सपा और बसपा नेताओं का कहना है कि भाजपा मंदी के असर को पहले ही भांप गई है। इसलिए जल्दी चुनाव कराना चाहती है। चुनाव तय समय से पहले कराने के 3 बड़े कारण 1- एक ही स्टाफ, दो बड़ी ड्यूटियां देश में जनगणना का पहला चरण चल रहा है, जो 30 सितंबर तक चलेगा। इसका दूसरा चरण 9 से 28 फरवरी 2027 के बीच होना है। इसमें लोगों की सामाजिक-आर्थिक और जातीय जानकारी जुटाई जाएगी। यूपी में इसके लिए 5.25 लाख शिक्षकों और 600 से ज्यादा एसडीएम/डीएम की ड्यूटी लगी है। यूपी में बूथों की संख्या बढ़कर 1.77 लाख हो चुकी है। इसके लिए चुनाव ड्यूटी में 7 लाख से ज्यादा कर्मचारी चाहिए। निर्वाचन से जुड़े अधिकारियों का कहना है कि जो स्टाफ जनगणना कर रहा, वही चुनाव भी कराता है। अगर दोनों काम साथ हुए, तो सचिवालय से लेकर ग्राम पंचायतों तक पूरा सिस्टम ठप हो जाएगा। 2- बोर्ड परीक्षाओं का टकराव फरवरी-मार्च के महीने में ही यूपी, सीबीएसई और आईसीएसई की बोर्ड परीक्षाएं भी होती हैं। लाखों शिक्षक परीक्षा कराने और कॉपियां जांचने में व्यस्त रहते हैं। 2022 में विधानसभा चुनाव के बाद बोर्ड परीक्षाएं करवाई गई थीं। 3- आर्थिक मंदी और महंगाई से बदलता माहौल पीएम नरेंद्र मोदी और विपक्ष के नेता राहुल गांधी भी आने वाले दिनों में आर्थिक संकट और महंगाई को लेकर चिंता जता चुके हैं। वित्तीय वर्ष की आखिरी तिमाही (जनवरी-मार्च) में मंदी और महंगाई का असर जनता पर सीधे दिख सकता है। ऐसे में लोगों की नाराजगी सत्ताधारी पार्टी से हो सकती है। भाजपा ऐसा रिस्क नहीं लेना चाहेगी। यूपी के राजनीतिक दलों की तैयारियां चुनावी आहट मिलते ही यूपी के सभी राजनीतिक दल 'इलेक्शन मोड' में आ गए हैं। 2022 की बात करें, तो बसपा ने अपने कोऑर्डिनेटर और प्रभारी पहले तय कर दिए थे। पहली सूची 15 जनवरी को जारी हुई थी। सपा ने आचार संहिता लगने के बाद 13 जनवरी 2022 को अपनी पहली सूची जारी की थी। भाजपा की 15 जनवरी, 2022 को पहली सूची सार्वजनिक की थी। इस बार कैसी तैयारी है, दैनिक भास्कर ने भाजपा, सपा और बसपा के पदाधिकारियों से बात करके समझा… भाजपा ने प्रभारी मंत्रियों को जिलों में भेजा सपा ने 200 कैंडिडेट तय किए, समय से पहले नाम घोषित होंगे सुभासपा और बसपा कैंडिडेट फाइनल कर चुकी ओम प्रकाश राजभर की सुभासपा ने 44 सीटों पर प्रभारी तैनात कर दिए हैं। चुनाव में यही कैंडिडेट होंगे। बसपा प्रमुख मायावती ने भी अंदरखाने करीब 50 सीटों पर अपने प्रभारियों के नाम फाइनल कर दिए हैं। इनमें 5 नाम सार्वजनिक किए हैं। मायावती ने जिलों के प्रभारियों के साथ बैठक करके उन्हें क्षेत्र में चुनावी माहौल बनाने के लिए कहा है। जल्द चुनाव से किसे फायदा, एक्सपर्ट से समझिए वरिष्ठ पत्रकार योगेश मिश्रा कहते हैं- सरकार विपक्ष को तैयारी का मौका नहीं देना चाहती। चुनाव के समय ही जनगणना का दूसरा चरण रखना साफ इशारा है कि सरकार वक्त से पहले चुनाव चाहती है। भाजपा का मानना है कि अचानक चुनाव कराने से विपक्षी दलों को तैयारी का पूरा मौका नहीं मिलेगा। इसके अलावा, मंदी का असर ग्राउंड पर दिखने से पहले चुनाव कराना सरकार के लिए सुरक्षित रहेगा। वरिष्ठ पत्रकार वीरेंद्रनाथ भट्ट कहते हैं- जनगणना और चुनाव एक साथ कराना प्रशासनिक मशीनरी के लिए बेहद मुश्किल है। जहां तक महंगाई का सवाल है, यह सरकार की नाकामी नहीं, बल्कि ईरान-अमेरिका युद्ध की वजह से है। हालांकि, इसका चुनाव पर असर पड़ता है। इसलिए सरकार इसके प्रभाव से बचने के लिए चुनाव पहले करा सकती है। देखना होगा कि क्या सपा इसे कितना भुना पाती है? चुनाव की तस्वीर वोटर लिस्ट प्रकाशन से सामने आएगी मुख्य निर्वाचन अधिकारी दफ्तर के एक अधिकारी कहते हैं- अगर जनवरी से पहले चुनाव कराए जाते हैं, तो एसआईआर 2025-26 की मतदाता सूची को आधार बनाया जा सकता है। पहले चुनाव होते हैं, तब भी आयोग के पास तैयारियों के लिए पर्याप्त समय है। --------------------------------------- भास्कर एक्सक्लूसिव भी पढ़िए- यूपी के 4 सांसदों की लद्दाख में तबीयत बिगड़ी, लालगंज सांसद को खून की उल्टी, AIIMS में भर्ती यूपी के 4 सांसदों की लेह-लद्दाख में तबीयत बिगड़ गई। ऊंचाई पर ऑक्सीजन की कमी के चलते सांसदों को सांस लेने में भारी तकलीफ हुई। एक सांसद को नाक और मुंह से खून की उल्टी होने के बाद दिल्ली एम्स में भर्ती कराना पड़ा। वहीं, अन्य सांसदों को गाड़ी से लेकर होटल तक ऑक्सीजन सपोर्ट पर रहना पड़ा। पढ़िए पूरी खबर…
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