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    खेतों के कचरे से बनेगा नया ईंधन! जानिए क्या है 2G इथेनॉल टेक्नोलॉजी और किन-किन क्षेत्रों में आएगा काम

    6 days ago

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    2G Ethanol: इथेनॉल आज भारत के ऊर्जा क्षेत्र का एक महत्वपूर्ण हिस्सा बन चुका है. सरकार लगातार पेट्रोल में इथेनॉल की मात्रा बढ़ा रही है ताकि कच्चे तेल के आयात पर निर्भरता कम की जा सके. लेकिन इथेनॉल को लेकर एक बड़ी चिंता यह भी रही है कि इसका उत्पादन गन्ने और खाद्यान्न फसलों से होता है जिससे खाद्य सुरक्षा पर असर पड़ सकता है. इसी चुनौती का समाधान लेकर आई है 2G यानी सेकेंड जनरेशन इथेनॉल तकनीक. 2G इथेनॉल को इथेनॉल उत्पादन की एडवांस तकनीक माना जाता है. इसकी सबसे बड़ी खासियत यह है कि इसे खाने योग्य फसलों के बजाय कृषि अवशेषों और जैविक कचरे से तैयार किया जाता है. इससे न केवल खाद्यान्न की बचत होती है बल्कि खेतों में जलाए जाने वाले कृषि वेस्ट का भी बेहतर इस्तेमाल संभव हो जाता है. क्या होता है 2G इथेनॉल? सेकेंड जनरेशन इथेनॉल ऐसा जैव ईंधन है जिसे पराली, गन्ने की खोई (बैगास), मक्के के डंठल, बांस और अन्य कृषि कचरों से बनाया जाता है. जहां पहली पीढ़ी का इथेनॉल मुख्य रूप से गन्ने के रस या अनाज पर आधारित था वहीं 2G इथेनॉल पूरी तरह कृषि कचरे का इस्तेमाल करता है. इस तकनीक की वजह से खाद्यान्न संसाधनों पर दबाव नहीं पड़ता और किसानों को अपने खेतों से निकलने वाले बेकार अवशेषों से अतिरिक्त आय का अवसर भी मिल सकता है. साथ ही, पराली जलाने जैसी समस्याओं में भी कमी आने की संभावना रहती है जिससे वायु प्रदूषण को कंट्रोल करने में मदद मिल सकती है. 2G इथेनॉल कैसे तैयार किया जाता है? 2G इथेनॉल का निर्माण एक आधुनिक और तकनीकी प्रोसेस के जरिए किया जाता है. सबसे पहले खेतों से पराली, गन्ने की खोई, मक्के के डंठल या अन्य कृषि अवशेष एकत्र करके संयंत्रों तक पहुंचाए जाते हैं. इसके बाद इन सामग्रियों को छोटे-छोटे टुकड़ों में काटा जाता है और विशेष रासायनिक या भाप आधारित प्रक्रिया के माध्यम से इनके कठोर रेशों को नरम किया जाता है. अगले चरण में विशेष एंजाइम्स का उपयोग कर इन अवशेषों में मौजूद जटिल कार्बोहाइड्रेट को साधारण शर्करा में बदला जाता है. फिर इस शर्करा को यीस्ट के साथ किण्वित किया जाता है जिससे अल्कोहल का निर्माण होता है. अंत में डिस्टिलेशन और शुद्धिकरण प्रक्रिया के जरिए पानी अलग कर हाई क्वालिटी वाला 2G इथेनॉल प्राप्त किया जाता है. पर्यावरण और ऊर्जा सुरक्षा के लिए क्यों है महत्वपूर्ण? भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों का बड़ा हिस्सा आयातित कच्चे तेल से पूरा करता है. 2G इथेनॉल का व्यापक उपयोग देश की विदेशी तेल पर निर्भरता कम करने में मदद कर सकता है. इसके अलावा, कृषि कचरे को जलाने के बजाय उपयोग में लाने से कार्बन उत्सर्जन और प्रदूषण में भी कमी लाई जा सकती है. यह तकनीक किसानों, पर्यावरण और ऊर्जा क्षेत्र तीनों के लिए फायदेमंद मानी जा रही है. किसानों को अतिरिक्त आय मिल सकती है, प्रदूषण कम हो सकता है और देश को स्वदेशी ऊर्जा स्रोत भी प्राप्त हो सकता है. सिर्फ गाड़ियों तक सीमित नहीं है इसका इस्तेमाल अधिकांश लोग इथेनॉल को केवल वाहनों में इस्तेमाल होने वाले ईंधन के रूप में जानते हैं, लेकिन 2G इथेनॉल की उपयोगिता इससे कहीं अधिक है. इसका इस्तेमाल सस्टेनेबल एविएशन फ्यूल (SAF) के निर्माण में किया जा सकता है जिससे कार्बन उत्सर्जन को कम करने में सहायता मिलती है. इसके अलावा पेंट, प्लास्टिक, कॉस्मेटिक्स और दवा उद्योगों में भी इसका इस्तेमाल कच्चे माल के रूप में किया जा सकता है. विशेषज्ञों का मानना है कि 2G इथेनॉल से बायोप्लास्टिक का उत्पादन भी संभव है जो पुराने प्लास्टिक की तुलना में पर्यावरण के लिए कम हानिकारक होता है और अपेक्षाकृत आसानी से विघटित हो सकता है. इथेनॉल उत्पादन संयंत्रों से निकलने वाले अवशेषों का इस्तेमाल बिजली उत्पादन में भी किया जा सकता है. दुनिया के कुछ देशों में इथेनॉल आधारित इंजनों और ऊर्जा प्रणालियों पर भी तेजी से काम हो रहा है जो भविष्य में स्वच्छ ऊर्जा के नए विकल्प प्रदान कर सकते हैं. यह भी पढ़ें: फुल नेटवर्क के बावजूद नहीं चल रहा WiFi? जानिए क्या है इंटरनेट न चलने की असली वजह
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