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    Explained: जापान के बाद नेपाल में भारत के आम बैन क्यों? जो हम खाते, विदेश में छू भी नहीं रहे, माजरा क्या?

    9 hours ago

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    भारतीय आम की मिठास और खुशबू का दुनिया में कोई जवाब नहीं है, लेकिन इस बार आम के सीजन के बीच एक बुरी खबर ने किसानों और एक्सपोर्टर्स की चिंता बढ़ा दी है. पहले जापान ने भारतीय आमों पर रोक लगाई और अब नेपाल ने भी यही रास्ता अपना लिया है. 9 जून 2026 को नेपाल के कृषि मंत्रालय ने ऐलान किया कि भारत से आने वाले ताजे आमों के आयात पर फिलहाल रोक रहेगी. वजह वही बताई गई जो जापान के मामले में सामने आई थी. तो क्या भारतीय आम की क्वालिटी खराब हो गई है, क्या दुनिया से इसकी डिमांड खत्म हो रही है और क्या है इस उलझन की असल कहानी? नेपाल और जापान ने भारत के आमों पर क्यों लगाया बैन? नेपाल ने यह प्रतिबंध अपनी राजधानी काठमांडू और अन्य बॉर्डर पॉइंट्स पर भारतीय आमों की जांच के बाद लगाया. खेपों से सैंपल लेकर टेस्ट किए गए तो उसमें कई बार मानक से ऊपर कार्बोफ्यूरॉन और साइपरमेथ्रिन जैसे कीटनाशकों के अंश मिले. इसके साथ ही ओरिएंटल फ्रूट फ्लाई (बैक्ट्रोसेरा डोर्सालिस) के लार्वा भी पाए गए. नेपाल के प्लांट क्वारंटाइन अधिकारियों का कहना है कि फ्रूट फ्लाई उनके यहां के आम, लीची और दूसरे फलों की फसल को तबाह कर सकती है, इसलिए तत्काल रोक जरूरी थी. फिलहाल यह बैन अस्थायी है, लेकिन तब तक जारी रहेगा जब तक भारत अपनी खेपों की क्वालिटी का पुख्ता सबूत नहीं देता. जापान ने भी इसी तरह जून 2024 में तब बैन लगाया जब वहां भारतीय आम की कुछ खेपों में कीट और कीटनाशक मिले. हालांकि जापान वैसे भी किसी भी देश से आयातित ताजे फलों पर बेहद सख्त सेनिटरी-फाइटोसैनिटरी (SPS) नियम लागू करता है और वहां वेपर हीट ट्रीटमेंट (VHT) अनिवार्य है. बीते सालों में भारत ने VHT फेसिलिटी बढ़ाकर जापानी बाजार में फिर से जगह बनाई थी, लेकिन एक बार फिर नियमों में चूक निर्यात पर भारी पड़ गई. नेपाल का मामला इसलिए भी चर्चा में है क्योंकि वह भारत के सबसे पास का और भरोसेमंद पड़ोसी बाजार है, जहां से आम सीधे सड़क मार्ग से जाता है और इसके रुकने का सीधा असर छोटे किसानों और सीमावर्ती राज्यों पर पड़ता है. भारत दुनिया का सबसे बड़ा आम उत्पादक फिर एक्सपोर्ट कम क्यों? ये बैन सुनने में छोटे लग सकते हैं लेकिन असलियत में भारत के लिए यह एक बड़ी चुनौती की तरफ इशारा करते हैं. भारत सालाना 2.5 करोड़ मीट्रिक टन (25 मिलियन टन) से भी ज्यादा आम पैदा करता है. यह दुनिया के कुल आम उत्पादन का लगभग 40-45 फीसदी है. देश में 1,500 से ज्यादा किस्में उगाई जाती हैं और करीब 25 लाख हेक्टेयर भूमि पर आम की बागवानी होती है. इसके बावजूद भारत अपने कुल आम का महज 1 प्रतिशत से भी कम हिस्सा विदेश भेज पाता है. बाकी 99 फीसदी आम हम खुद ही खा जाते हैं या फिर प्रोसेसिंग में इस्तेमाल होता है. ताजा आम के मामले में तो यह आंकड़ा और भी कम हो जाता है. इतने कम एक्सपोर्ट की सबसे बड़ी वजह है हमारे आमों का अंतरराष्ट्रीय गुणवत्ता मानकों पर खरा न उतरना. ज्यादातर आम या तो अनियोजित तरीके से उगाए जाते हैं, या तोड़ाई के बाद उन्हें ठीक से साफ नहीं किया जाता. कीट खत्म करने के पुख्ता उपाय नहीं होते और कोल्ड चेन जैसी सप्लाई चेन की कमी रहती है. पोस्ट-हार्वेस्ट नुकसान भी 25-30 फीसदी तक हो जाता है. ऊपर से हर देश के अपने क्वारंटाइन नियम हैं. अमेरिका, जापान, साउथ कोरिया और ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों में आम भेजने के लिए इरडिएशन या वेपर हीट ट्रीटमेंट जैसी प्रक्रियाओं से गुजरना होता है. भारत कितना आम विदेश भेजता है और कहां-कहां जाता है यह आम? वाणिज्य मंत्रालय और APEDA के आंकड़ों पर नजर डालें तो 2022-23 में भारत ने करीब 27,873 मीट्रिक टन ताजा आम का निर्यात किया, जिसकी कीमत लगभग 42.98 मिलियन अमेरिकी डॉलर (करीब 350 करोड़ रुपये) रही. इसके अगले साल 2023-24 में यह आंकड़ा कुछ बढ़कर 32,000 मीट्रिक टन के पार पहुंच गया और कमाई 55 मिलियन डॉलर के करीब रही. यह पिछले पांच सालों की तुलना में काफी तेज बढ़त है, लेकिन कुल उत्पादन के सामने अब भी बहुत छोटी है. भारतीय आम 80 से ज्यादा देशों में भेजा जाता है, लेकिन सबसे ज्यादा खपत खाड़ी देशों में है. संयुक्त अरब अमीरात (UAE) सबसे बड़ा खरीदार है. इसके बाद सऊदी अरब, कतर, कुवैत, ओमान और बहरीन आते हैं. यूरोप में यूनाइटेड किंगडम भारतीय आम का पुराना बाजार है और ताजा कोशिशों के तहत अब जर्मनी, नीदरलैंड और फ्रांस भी इसे मंगवा रहे हैं. अमेरिका में साल 2007 के बाद भारतीय आम की वापसी हुई थी और तब से वहां हर साल इरडिएटेड आम की डिमांड बढ़ रही है. अमेरिका को भेजे जाने वाले आम मुख्य रूप से महाराष्ट्र के वाशी स्थित इरडिएशन प्लांट से गुजरते हैं. साउथ कोरिया, जापान, न्यूजीलैंड और मलेशिया भी उभरते हुए बाजार हैं. हाल में उत्तर प्रदेश से UK को पहली व्यावसायिक खेप भेजी गई, जिससे नए उत्पादक क्षेत्रों के लिए राह खुली है. बांग्लादेश, नेपाल और श्रीलंका जैसे पड़ोसी देश पारंपरिक रूप से बड़ी मात्रा में आम लेते रहे हैं, लेकिन अब नेपाल के बैन से साफ है कि क्वालिटी पर कोई समझौता नहीं चलेगा. आम से होने वाली कमाई का पूरा इकोनॉमिक्स क्या? सिर्फ ताजा आम ही नहीं, बल्कि आम का गूदा (पल्प), आम की प्यूरी, अचार, चटनी, स्लाइस और जूस मिलाकर भारत सालाना 100 मिलियन डॉलर (लगभग 850 करोड़ रुपये) से ज्यादा का निर्यात करता है. APEDA के मुताबिक, पिछले कुछ सालों में मैंगो पल्प एक्सपोर्ट ने ताजा आम के मुकाबले ज्यादा ग्रोथ दिखाई है. सबसे ज्यादा पल्प सऊदी अरब, यमन, नीदरलैंड और बांग्लादेश को जाता है. लेकिन सिर्फ ताजा आम की बात करें तो घरेलू बाजार में इसका कारोबार 1.5 लाख करोड़ रुपये से भी ऊपर बैठता है, जिससे करोड़ों किसानों, मजदूरों, फेरीवालों, ट्रांसपोर्टरों और निर्यातकों को रोजगार मिलता है. आम भारत की कृषि अर्थव्यवस्था का एक भावनात्मक और आर्थिक दोनों रूप से बेहद अहम हिस्सा है. भारत से आम का निर्यात बढ़ने में क्या रुकावटें? आम की कहानी का सबसे दिलचस्प और थोड़ा दुखद पहलू यह है कि हमारे पास दुनिया का सबसे बेहतरीन फल है, फिर भी हम वैश्विक निर्यात बाजार में मैक्सिको, थाईलैंड, ब्राजील और पेरू जैसे देशों से बहुत पीछे हैं. इसकी 5 बड़ी वजहें हैं: खेती का बिखरा ढांचा: भारत में आम की खेती ज्यादातर छोटे और मझोले किसान करते हैं, जिनके लिए महंगी कीटनाशक प्रबंधन तकनीक, ग्लोबल सर्टिफिकेशन और कोल्ड स्टोरेज जैसी चीजें सपने जैसी होती हैं. क्वालिटी कंट्रोल की कमी: निर्यात योग्य आम के लिए हर फल का एक निश्चित आकार, रंग, शुगर लेवल और कीट-मुक्त होना जरूरी है, लेकिन हमारे यहां ग्रेडिंग और पैकिंग की आधुनिक सुविधाएं सीमित हैं. सख्त फाइटोसैनिटरी नियम: अमेरिका, जापान और यूरोप जैसे बाजारों में एंट्री के लिए इरडिएशन या VHT अनिवार्य है. इरडिएशन की सुविधा फिलहाल सिर्फ महाराष्ट्र, गुजरात और उत्तर प्रदेश समेत कुछ ही जगहों पर है. हवाई किराया और लॉजिस्टिक्स: ताजा आम जल्दी खराब होता है इसलिए हवाई मार्ग से भेजना पड़ता है, जो बहुत महंगा है. सी-रूट के लिए शेल्फ लाइफ बढ़ाने वाली तकनीकें कम हैं. बदलता मौसम और कीट की दिक्कत: बेमौसम बारिश, ओलावृष्टि और फ्रूट फ्लाई जैसे कीट हर साल किसानों का नुकसान करते हैं, जिसका सीधा असर निर्यात क्षमता पर पड़ता है. फिर कैसे पूरी होती है दुनिया की मांग और आगे की राह क्या है बीते तीन-चार सालों में सरकार और APEDA ने मिलकर कई ठोस कदम उठाए हैं. 'एक जिला एक उत्पाद’ योजना के तहत आम उत्पादक जिलों में क्लस्टर बनाकर पैक हाउस, VHT प्लांट और कोल्ड स्टोरेज स्थापित किए जा रहे हैं. क्लस्टर बेस्ड एक्सपोर्ट प्रमोशन के जरिये मुजफ्फरपुर (बिहार), मलिहाबाद (यूपी), चित्तूर (आंध्र प्रदेश), रत्नागिरी (महाराष्ट्र) और कृष्णागिरी (तमिलनाडु) जैसे इलाकों को सीधे विदेशी खरीदारों से जोड़ा जा रहा है. वाशी के अलावा अब देश में कई इरडिएशन सेंटर काम कर रहे हैं. किसानों को ग्लोबल और ऑर्गेनिक सर्टिफिकेशन के लिए आर्थिक मदद दी जा रही है ताकि वे बिना ज्यादा केमिकल वाले आम उगा सकें. पिछले सीजन में भारत ने पहली बार मोजाम्बिक, बहरीन और स्लोवाकिया जैसे नए बाजारों में भी आम भेजे. समुद्री मार्ग से आम भेजने के लिए 'सी-शिपमेंट प्रोटोकॉल' पर काम हो रहा है, जिससे लागत कम होगी और निर्यात बढ़ेगा. इसके साथ ही नेपाल और जापान जैसे बैन से निपटने के लिए भारतीय कृषि मंत्रालय ने पेस्टिसाइड रेसिड्यू टेस्टिंग लैब और फ्रूट फ्लाई मॉनिटरिंग नेटवर्क को और मजबूत करने की योजना बनाई है.
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