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    Explained: रात का पारा 5 डिग्री बढ़ने का मतलब और शरीर पर असर क्या, कैसे 50% बढ़ जाता मौत का जोखिम?

    2 weeks ago

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    दिन में पारा 45 डिग्री के पार और रात में भी 5 डिग्री सेल्सियस तक की बढ़ोतरी. ये कोई मौसम विभाग की सूखी रिपोर्ट नहीं, बल्कि इस साल की वो भयानक सच्चाई है जिसने करोड़ों भारतीयों की रातों की नींद और सेहत दोनों छीन ली है. अप्रैल 2026 के आखिरी हफ्ते में देश के 17 से ज्यादा शहरों में रात का न्यूनतम तापमान सामान्य से 5 डिग्री सेल्सियस ज्यादा दर्ज किया गया. ये बढ़ोतरी सिर्फ एक आंकड़ा भर नहीं है, बल्कि ये इंसानी शरीर के लिए एक 'साइलेंट किलर' साबित हो रही है. आइए समझते हैं कि ये 'रात की बढ़ती गर्मी' आखिर है क्या, शरीर को किस तरह तोड़ रही हैं और आने वाले दिनों में हालात और भयावह क्यों होने वाले हैं... रात का पारा 5 डिग्री बढ़ने का मतलब क्या है? जब हम 'रात का तापमान 5 डिग्री बढ़ने' की बात करते हैं, तो इसका मतलब है कि दिन ढलने के बाद पारा सामान्य से कहीं ज्यादा ऊपर रह रहा है. मसलन, दिल्ली में अप्रैल 2026 के दौरान रात का तापमान लगातार 2020-2025 के औसत और 1991-2020 के सामान्य स्तर से ऊपर रहा. 29 अप्रैल को तो यह बढ़कर 28.5 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच गया. वहीं, हैदराबाद में रात का न्यूनतम पारा 28.8 डिग्री सेल्सियस पर स्थिर रहा, जो सामान्य से 2 डिग्री ज्यादा था. इसे 'वार्म नाइट्स' या 'हॉट नाइट्स' कहा जाता है. साइंटिस्ट के लिए यह तब की स्थिति है जब रात का तापमान इतना ज्यादा हो कि शरीर को दिन की तपिश से उबरने का मौका ही न मिले. यह स्थिति अब सिर्फ मई-जून तक सीमित नहीं रही, बल्कि अप्रैल में ही दिखने लगी है. शरीर के साथ क्या होता है जब रातें गर्म होती हैं? दरअसल, इंसानी शरीर को एक प्राकृतिक कूलिंग सिस्टम की तरह डिजाइन किया गया है. दिन की भीषण गर्मी के बाद रात का ठंडा तापमान शरीर के कोर टेम्प्रेचर को वापस सामान्य करता है, जिससे हमारे बॉडी पार्ट्स को आराम और रिकवरी मिलती है. लेकिन जब रात का तापमान 28-30 डिग्री सेल्सियस के बीच बना रहता है, तो यह प्राकृतिक प्रक्रिया पूरी तरह से ध्वस्त हो जाती है. एक अध्ययन तो यह भी बताता है कि अगर रात का तापमान 30 डिग्री सेल्सियस से ऊपर चला जाए, तो मृत्यु दर 265% तक बढ़ सकती है. शरीर पर इसके प्रभाव को ऐसे समझिए: दिल और दिमाग पर सीधी चोट: लगातार गर्म रातें दिल की बीमारियों और स्ट्रोक के खतरे को कई गुना बढ़ा देती हैं. रिपोर्ट्स के मुताबिक, जिन दिनों गर्म रातें होती हैं, उन दिनों मौत का जोखिम सामान्य रातों की तुलना में 50% ज्यादा होता है. बीमारियों का अटैक: गर्म रातें सिर्फ हीट स्ट्रोक ही नहीं लातीं, बल्कि डायबिटीज और हाइपरटेंशन जैसी गैर-संचारी बीमारियों को भी गंभीर रूप से बढ़ा देती हैं. मानसिक सेहत का बिखरना: गर्मी के कारण खराब नींद से रोग प्रतिरोधक क्षमता कमजोर होती है, एकाग्रता भंग होती है, थकान बढ़ती है और मानसिक स्वास्थ्य पर बेहद बुरा असर पड़ता है. AC-कूलर भी हो रहे फेल, क्यों नहीं आती नींद? इस सबकी जड़ में है नींद का गायब होना. हमारी नींद के लिए शरीर का ठंडा होना बेहद जरूरी है. चेन्नई की एक स्टडी में पाया गया कि मिडिल और लोअर मिडिल क्लास के घरों के अंदर का तापमान रात में 32 डिग्री सेल्सियस से ऊपर बना रहा. कुछ मामलों में तो यह 35 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच गया. दीवारें और छतें दिन भर की गर्मी सोखकर रात में रेडिएट करती हैं, जिससे पंखे और कूलर बेअसर हो जाते हैं. एक कंट्रोल्ड स्टडी में यह भी पाया गया कि रात के बढ़ते तापमान से नींद के दौरान शरीर का मुख्य तापमान बढ़ जाता है, जिससे नींद उथली और अधूरी रह जाती है. शहर तवे की तरह क्यों तप रहे हैं? सीनियर एनवॉयर्नमेंटलिस्ट डॉ. प्रोफेसर सुभाष सी. पांडे का मानना है कि शहरों में यह समस्या और भी गंभीर है, जिसकी वजह है 'अर्बन हीट आइलैंड इफेक्ट'. शहरों में कंक्रीट, सड़कें, ईंटें और धातु दिन भर गर्मी सोखते हैं और रात में उसे छोड़ते हैं. हरियाली की कमी, जलाशयों का खत्म होना और ऊंची इमारतों की भीड़ इस गर्मी को और कैद कर लेती है. 93% जिले बहुत ज्यादा या ज्यादा गर्मी के जोखिम वाली कैटेगरी में आते हैं. इसकी एक बड़ी वजह अर्बन हीट आइलैंड का बनना है. क्या आने वाले दिनों में हालात और ज्यादा बिगड़ेंगे? गर्मी का प्रकोप यहीं नहीं रुकने वाला. एक जलवायु आकलन के मुताबिक, इस सदी के अंत तक भारत में सबसे गर्म दिन का तापमान 4.7 डिग्री सेल्सियस तक बढ़ सकता है, जबकि सबसे ठंडी रात का तापमान 5.5 डिग्री सेल्सियस तक उछल सकता है. यानी, रातें दिनों से भी ज्यादा तेजी से गर्म होंगी. इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि दुनिया के 83% बड़े शहरों में रात का तापमान लगातार खतरनाक स्तर पर बढ़ रहा है. यह तस्वीर डरावनी है, लेकिन कुछ आसान उपाय अपनाकर इस खतरे को कम किया जा सकता है: हाइड्रेटेड रहें: सिर्फ दिन में ही नहीं, शाम और रात में भी पर्याप्त पानी और इलेक्ट्रोलाइट वाले लिक्विड पीते रहें. घर को ठंडा रखने की कोशिश करें: दिन में खिड़कियों पर परदे डालकर रखें ताकि गर्मी अंदर न आए. रात में हवा का क्रॉस-वेंटिलेशन बनाएं. हो सके तो छतों पर 'कूल रूफ' टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल करें. सोने का तरीका बदलें: हल्के सूती कपड़े पहनकर सोएं. बिस्तर पर सूती चादर का इस्तेमाल करें. सोने से पहले भारी भोजन न करें. कमजोर लोगों का खास ख्याल: बुजुर्ग, बच्चे, गर्भवती महिलाएं और पहले से बीमार लोग गर्म रातों के प्रति सबसे ज्यादा संवेदनशील होते हैं. ऐसे में परिवार के इन सदस्यों की सेहत पर खास ध्यान देने की जरूरत है. प्रशासनिक पहल: सरकार और शहरी नियोजन संस्थानों को हीट एक्शन प्लान में रात के तापमान की निगरानी और उससे निपटने के उपायों को भी शामिल करना होगा. अभी तक ज्यादातर योजनाएं सिर्फ दिन की गर्मी पर फोकस करती हैं. शहरों में हरियाली बढ़ाना, तालाबों को पुनर्जीवित करना और वेंटिलेशन कॉरिडोर बनाना भविष्य के लिए बेहद जरूरी कदम हैं. आखिर ये संकट कितना बड़ा है? डॉ. सुभाष सी पांडे कहते हैं, 'यह कोई छोटी-मोटी समस्या नहीं है. देश का 57% हिस्सा हाई हीट रिस्क जोन में आ चुका है, जहां देश की 76% आबादी रहती है. 2012 से 2022 के बीच 70% से ज्यादा जिलों ने हर गर्मी के मौसम में पांच या उससे ज्यादा अतिरिक्त गर्म रातों का अनुभव किया. यह एक राष्ट्रव्यापी स्वास्थ्य संकट है जो धीरे-धीरे और गहराता जा रहा है.' रात का बढ़ता तापमान अब सिर्फ बेचैनी की बात नहीं रह गया है, बल्कि यह एक जानलेवा स्वास्थ्य जोखिम बन चुका है. जब शरीर को रात में राहत नहीं मिलती, तो वह अगले दिन की गर्मी झेलने के लिए तैयार नहीं हो पाता, और यही चक्र हर दिन हमें थोड़ा-थोड़ा अंदर से तोड़ता रहता है. फिलहाल, यह साइलेंट किलर हमारी नींद और सेहत पर जो असर डाल रहा है, उसे समझना और इससे बचने के उपाय करना ही सबसे बड़ा बचाव है.
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