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    Explained: 'गुड नाइट कहकर सोए पति, सुबह अमेरिकी मिसाइल ने सब कुछ मिटा दिया', 3 भारतीय नाविकों के परिवारों की दर्दनाक कहानी

    2 hours ago

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    'गुड नाइट, बच्चों का ख्याल रखना...' चीफ इंजीनियर पटनाला सुरेश ने 9 जून की रात अपनी पत्नी को यह आखिरी मैसेज भेजा था. अगली सुबह उनकी पत्नी का 'गुड मॉर्निंग' अनसीन रह गया. अमेरिकी मिसाइल ने ओमान की खाड़ी में उनके जहाज MT Settebello के इंजन रूम को चीर दिया था. 44 साल के सुरेश, 23 साल के डेक कैडेट आदित्य शर्मा और 37 साल के इंजन फिटर शिवानंद चौरसिया भारतीय नाविक उस हमले में मारे गए. एक साल की सालगिरह की तैयारी कर रही पत्नी, इकलौते बेटे को खो चुके बुजुर्ग माता-पिता और 'पापा जल्दी आ रहे हैं' कहकर गए युवा कैडेट के सपने तबाह हो गए. तीन परिवार बिना किसी ठोस जवाब के एक सवाल के साथ बैठे हैं- 'आखिर हमारे अपनों को क्यों मरना पड़ा?' तीन शव और तीन तबाहियां- परिवार दर परिवार कहानी 1. आदित्य शर्मा- डेक कैडेट, हिमाचल प्रदेश आदित्य शर्मा एक डेक कैडेट थे यानी एक ऐसा स्टूडेंट जो भविष्य में जहाज का अधिकारी बनने का सपना देख रहे थे. पिछले साल नवंबर में वह दुबई से चीन के लिए रवाना हुए थे और मई 2026 में घर लौटने वाले थे. लेकिन कुछ कारणों से उनकी ड्यूटी बढ़ा दी गई थी. मई में जब उसके पिता राजेश शर्मा ने उससे बात की, तो आदित्य ने कहा था, 'पापा, मैं एक और महीना रुकूंगा, फिर पक्का घर आ रहा हूं.' वो आखिरी बार 8 जून को अपने पिता से फोन पर बात कर पाए थे. उसने उन्हें बताया था कि जहाज ओमान की तरफ बढ़ रहा है और कप्तान खाड़ी क्षेत्र में दाखिल होने की योजना बना रहा है. पिता को थोड़ी चिंता हुई, लेकिन उन्होंने सोचा कि व्यापारिक जहाजों पर कभी हमला नहीं होता. हमले के बाद पिता राजेश ने मीडिया से कहा, 'मुझे चिंता नहीं हुई. ऐसे जहाजों पर हमला नहीं होता. जो हुआ, वह पूरी तरह हैरान करने वाला था. यह गलत था.' जब हमले की खबर फैली, तो परिवार में हड़कंप मच गया. आदित्य के चाचा संजीव को 9 जून रात करीब 9 बजे फोन आया कि आदित्य लापता है. वह तुरंत जालंधर में अपने भाई के घर पहुंचे. पूरी रात वे कंपनी से संपर्क करने की कोशिश करते रहे, लेकिन कोई जानकारी नहीं मिली. रात 1:30 बजे उन्हें पता चला कि आदित्य अब इस दुनिया में नहीं है. आदित्य के दादा अशोक ने सबसे बड़ा सवाल उठाया, 'हम जानना चाहते हैं कि जब कप्तान को आगे न बढ़ने की चेतावनी दी गई थी, तो उन्होंने किस हैसियत से जहाज आगे बढ़ाया? हम जांच चाहते हैं.' पिता राजेश ने अमेरिका पर निशाना साधते हुए यह भी सवाल किया कि 21 चालक दल के सदस्य तो बच गए, लेकिन तीन कैसे मारे गए? एक और चौंकाने वाला खुलासा राजेश ने किया कि वह खुद जहाज की लोकेशन ट्रैक करते थे और अक्सर लोकेशन में गड़बड़ी नजर आती थी. कभी नेविगेशन सिस्टम पुरानी लोकेशन दिखाता, तो कभी ट्रैकिंग डिवाइस ही बंद कर दी जाती थी. जब आदित्य से पूछा, तो वह कहता था कि कई बार ट्रैकिंग डिवाइस को जानबूझकर बंद कर दिया जाता है. 2. शिवानंद चौरसिया, इंजन फिटर, उत्तर प्रदेश शिवानंद उत्तर प्रदेश के देवरिया जिले के सुरौली गांव में रहते थे. वह मुंबई से जहाज पर सवार हुए थे और एक इंजन फिटर के रूप में काम करते थे. वह अपनी पत्नी शुशीला और परिवार के लिए इकलौते कमाने वाले थे. उनके सपने बहुत साधारण थे- बच्चों को पढ़ाना, घर चलाना और शायद कभी अपना एक छोटा सा घर बनाना. शिवानंद की मौत से गांव में मातम छा गया. रिश्तेदारों की निगाहें उस अमेरिकी विमान पर थीं, जिसने एक मिसाइल दागकर एक साधारण परिवार की उम्मीदों का उजाड़ कर दिया. शिवानंद उन लाखों भारतीयों में से एक थे, जो समुद्र के रास्ते दुनिया से जुड़ते हैं और अपनी मेहनत से अपनों का पेट भरते हैं. परिवार ने सवाल उठाया है कि आखिर एक व्यापारिक जहाज पर सवाल आम नागरिक को अमेरिकी सेना ने बिना कोई स्पष्ट चेतावनी के कैसे निशाना बना दिया. उनकी मांग है कि मामले की पूरी जांच हो और दोषियों के खिलाफ कार्रवाई हो. 3. पटनाला सुरेश, चीफ इंजीनियर, आंध्र प्रदेश तीनों में सबसे दर्दनाक कहानी शायद सुरेश की है. 44 वर्षीय सुरेश जहाज के चीफ इंजीनियर थे. वह अपने परिवार के इकलौते कमाने वाले थे . पत्नी भार्गवी, दो बेटे (13 और 10 साल के) और दो भतीजियां, जिनका पालन-पोषण भी वही कर रहे थे. सुरेश ने करीब 15 साल समुद्र में बिताए थे. हर साल उन्हें छह महीने की छुट्टी मिलती थी, लेकिन वह शायद ही कभी पूरी छुट्टी लेते थे. वह अपने काम से प्यार करते थे. इस बार भी वह एक छोटे असाइनमेंट के लिए निकले थे, लेकिन ऑपरेशनल देरी और बढ़ते तनाव के चलते उनकी वापसी टलती गई. 9-10 जून की दरम्यानी रात जब अमेरिकी मिसाइल जहाज के इंजन रूम में जा लगी, उस वक्त सुरेश वहां किसी जनरेटर में खराबी की जांच कर रहे थे. मिसाइल का सीधा निशाना इंजन रूम ही था. वहां से बच निकलने का कोई मौका नहीं था. भार्गवी ने बताया कि उनकी आखिरी बात 8 जून की रात हुई थी. सुरेश ने उन्हें मैसेज किया था- 'गुड नाइट. बच्चों का ख्याल रखना.' अगली सुबह जब भार्गवी ने हमेशा की तरह गुड मॉर्निंग का मैसेज भेजा, तो उसका कोई जवाब नहीं आया. भार्गवी ने कहा, 'मैं सोचती रही कि शायद वह बिजी हैं. उस वक्त वह आमतौर पर डेक पर नहीं होते.' सुरेश का परिवार 24 जून को उनकी सालगिरह मनाने की तैयारी कर रहा था. यह उनकी 15वीं सालगिरह थी. सुरेश पहले ही अपना रिलीविंग लेटर ले चुके थे और सिर्फ रिप्लेसमेंट आने का इंतजार कर रहे थे कि वह घर लौट आए. वो रिप्लेसमेंट कभी नहीं आया. भार्गवी ने बीबीसी से कहा, 'वहां (खाड़ी क्षेत्र में) हमले हो चुके हैं और कुछ लोग मारे गए हैं. लेकिन उसने मुझसे कहा था, 'मेरी चिंता मत करो. मैं सुरक्षित घर आऊंगा और हम अपनी सालगिरह ठीक से मनाएंगे' जब 11 जून की सुबह भार्गवी ने सुपरिंटेंडेंट से संपर्क किया, तो उन्हें बताया गया कि 21 चालक दल के सदस्य बच गए हैं, लेकिन तीन लापता हैं. रात ढलने तक दो शव मिल गए, लेकिन सुरेश अब भी लापता थे. अगले दिन दोपहर करीब 1 बजे सुरेश का शव मिल गया. भार्गवी ने PTI से कहा, 'हम चार थे. अब हम तीन हो गए हैं.' यह एक बात उस सब कुछ को समेट लेता है जो इस हादसे ने छीन लिया. परिवारों की मुख्य मांगें क्या हैं? इन तीन परिवारों की मांगें लगभग एक जैसी ही हैं. वो सबसे बुनियादी चीजें हैं जो किसी भी इंसान को मिलनी चाहिए जब वह अपने किसी को खोता है: शवों की तत्काल वापसी: हर परिवार सबसे पहले यही चाहता है कि उनके प्रियजनों के पार्थिव शरीर जल्द से जल्द भारत पहुंचाए जाएं, ताकि उनका अंतिम संस्कार सम्मान के साथ किया जा सके. आदित्य का परिवार हिमाचल में उसका इंतजार कर रहा है, शिवानंद का गांव उसे आखिरी बार देखने को बेताब है और सुरेश की पत्नी अब भी उसकी तस्वीर की मांग कर रही है. बेहतर मुआवजा: सुरेश परिवार के इकलौते कमाने वाले थे. दो बच्चों और दो भतीजियों का भविष्य अब अधर में लटक गया है. परिवारों ने सरकार से आर्थिक सहायता की मांग की है. स्वतंत्र जांच: परिवारों को इस बात का कोई भरोसा नहीं है कि अमेरिकी सेना का अपना बयान ही सच होगा. वे चाहते हैं कि एक अंतरराष्ट्रीय स्वतंत्र जांच हो, ताकि यह साफ हो सके कि वास्तव में क्या हुआ था. जवाबदेही: आदित्य के दादा ने सीधा सवाल किया कि जब कप्तान को आगे बढ़ने की चेतावनी दी गई थी, तो उन्होंने ऐसा क्यों किया? जब 21 लोग बच सकते हैं, तो तीन क्यों नहीं बच पाए? परिवारों को सिर्फ मुआवजा नहीं, सच्चाई चाहिए. क्या बोला अमेरिका और क्या है जहाज ऑपरेटर का पक्ष? अमेरिकी सेंट्रल कमांड (CENTCOM) का कहना है कि जहाज ने अमेरिकी नाकाबंदी का उल्लंघन किया, बार-बार चेतावनी के बावजूद नहीं रुका और ईरानी तेल ले जा रहा था. इस वजह से अमेरिकी लड़ाकू विमान ने इंजन रूम पर प्रेसिजन मिसाइल से हमला किया. जहाज के ऑपरेटर iOS Marine ने इस दावे को खारिज कर दिया. कंपनी का कहना है कि जहाज पूरी तरह वैध व्यापारिक काम कर रहा था, उसका ईरान से कोई लेना-देना नहीं था और न ही उसे हमले से पहले कोई चेतावनी मिली थी. कंपनी ने मामले की स्वतंत्र अंतरराष्ट्रीय जांच की मांग की है. भारत सरकार ने क्या किया? भारत सरकार ने फौरन कूटनीतिक स्तर पर कार्रवाई की. विदेश मंत्रालय (MEA) ने अमेरिकी चार्जे दी एफेयर्स जेसन मीक्स को तलब किया और कड़ा विरोध दर्ज कराया. MEA के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने कहा कि भारत ने अमेरिका को अपनी 'गहरी चिंता' से अवगत कराया और इस तरह के हमलों पर रोक लगाने की मांग की. शिपिंग मंत्री सर्बानंद सोनोवाल ने X पर पोस्ट कर कहा कि मृत नाविकों के शवों को वापस लाने के प्रयास जारी हैं और उनकी मृत्यु भारत के समुद्री समुदाय के लिए 'गहरी क्षति' है. हालांकि, अब तक शव भारत नहीं पहुंच पाए हैं. परिवार उसी उलझन में हैं कि उनके प्रियजन कब आएंगे और क्या उन्हें कभी सच्चाई पता चलेगी?
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