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    Hybrid Solar System क्या होता है और क्या हैं इसके फायदे-नुकसान? यहां जान लें सारी बातें

    1 hour ago

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    Hybrid Solar System: अगर आप बिजली बिल की टेंशन के साथ-साथ पावर कट के झंझट से भी मुक्ति चाहते हैं तो हाइब्रिड सोलर सिस्टम आपके लिए सही ऑप्शन है. इसमें ऑन-ग्रिड और ऑफ-ग्रिड दोनों ही सिस्टम वाली खूबियां मिल जाती हैं, जो इसे एक परफेक्ट एनर्जी सॉल्यूशन बनाती है. इसलिए अगर आप सोलर एनर्जी सिस्टम लगवाने जा रहे हैं तो इस ऑप्शन के बारे में जरूर जान लें. आज हम आपको बताने जा रहे हैं कि Hybrid Solar System क्या होता है और इसके फायदे-नुकसान क्या हैं. क्या होता है Hybrid Solar System? यह एक ऐसा सोलर एनर्जी सिस्टम होता है, जो लिथियम बैटरी बैंक और पावर ग्रिड दोनों से कनेक्ट होता है. दिन में यह सनलाइट की मदद से बिजली जनरेट कर एनर्जी जरूरतों को पूरा करता है और साथ में बैटरियों को भी चार्ज करता है, जो रात में यूज हो सकती हैं. अगर इसके बाद एक्सेस एनर्जी बचती है तो इसे ग्रिड में सप्लाई किया जा सकता है. इसके लिए सोलर पैनल के साथ-साथ हाइब्रिड सोलर इन्वर्टर, बैटरी बैंक, ग्रिड कनेक्शन और नेट मीटर की जरूरत है. बाकी सिस्टम की तरह यह भी आसानी से 25-30 साल तक चल सकता है. Hybrid Solar System के फायदे क्या हैं? पावर बैकअप- पावर कट होने की स्थिति में यह सिस्टम बैकअप की तरह काम करता है. इसमें लगी बैटरियों से जरूरतें पूरी की जा सकती हैं. यह एक तरह से 24 घंटे काम करता है और आपको रात-दिन किसी भी समय बिजली को लेकर टेंशन नहीं रहती.बिल की बचत- यह सिस्टम बिजली बनाकर ग्रिड में एक्सपोर्ट कर सकता है, जिसके बदले आपको बिजली यूज करने को मिल जाती है और आपको हजारों रुपये बिल नहीं चुकाना पड़ता. क्लीन एनर्जी सोर्स- दूसरे सोलर सिस्टम की तरह इसमें बिजली जनरेट करने के लिए फॉसिल फ्यूल यूज नहीं करना पड़ता. यह सनलाइट से बिजली जनरेट करता है, जिसे पर्यावरण पर बुरा असर नहीं पड़ता. Hybrid Solar System के नुकसान क्या-क्या हैं? ज्यादा लागत- हाइब्रिड सोलर सिस्टम को लगाने की कॉस्ट बाकी सिस्टम से ज्यादा है. इसकी तुलना में ऑन-ग्रिड सोलर पावर सिस्टम काफी सस्ता पड़ता है. ज्यादा लागत होने के कारण पेबैक टाइम भी बढ़ जाता है. यानी बिजली बिल की बचत के जरिए इसकी लागत पूरी करने में ज्यादा टाइम लगेगा.बैटरी रिप्लेसमेंट का झंझट- सोलर पैनल आराम से 20-25 साल तक चल जाते हैं, लेकिन बैटरी लंबे टाइम तक नहीं चलती. इस कारण हर 5-7 साल बाद बैटरी रिप्लेसमेंट का झंझट रहता है, जो लागत को और बढ़ा देता है.मुश्किल इंस्टॉलेशन और मैंटेनेंस- ऑन-ग्रिड सिस्टम की तुलना में इसकी इंस्टॉलेशन मुश्किल होती है. इसमें ज्यादा वायरिंग और सेटिंग की जरूरत पड़ती है, जिस कारण मैंटेनेंस का झंझट भी बढ़ जाता है. ये भी पढ़ें- नया फोन खरीदने वालों को झटका! इस साल हर महीने बढ़ रहे हैं स्मार्टफोन के दाम
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