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    इंडिगो का FY30 तक 20 करोड़ पैसेंजर्स का टारगेट:550 से ज्यादा हवाई जहाज का प्लान, इंटरनेशनल कैपेसिटी 40% करने का लक्ष्य

    2 hours ago

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    भारत की सबसे बड़ी एयरलाइन इंडिगो ने वित्त वर्ष 2029-30 (FY30) के लिए अपना मेगा प्लान पेश किया है। कंपनी का लक्ष्य सालाना करीब 200 मिलियन (20 करोड़) यात्रियों को सफर कराना और भारत को एक बड़ा ग्लोबल एविएशन ट्रांजिट हब बनाना है। यह ब्लूप्रिंट 8 जून को एयरलाइन के 'एनालिस्ट डे' पर पेश किया गया। 5 फैक्टर्स: इंडिगो के लॉन्ग-टर्म प्लान की मुख्य बातें 550+ एयरक्राफ्ट का बेड़ा: कंपनी अपने बेड़े में हवाई जहाजों की संख्या बढ़ाकर 550 से अधिक करेगी। 3,000 डेली फ्लाइट्स: हर दिन देश-विदेश के लिए करीब 3,000 उड़ानें संचालित की जाएंगी। 40% इंटरनेशनल कैपेसिटी: कुल क्षमता का 40% हिस्सा इंटरनेशनल रूट्स पर लगाया जाएगा। दोगुना होगा स्केल: अवेलेबल सीट किलोमीटर (ASKs) को 300 बिलियन तक पहुंचाकर क्षमता को मौजूदा स्तर से लगभग दोगुना किया जाएगा। FY26 का रिकॉर्ड: कंपनी ने वित्त वर्ष 2025-26 (FY26) का अंत 441 विमानों के बेड़े और 123 मिलियन यानी 12.3 करोड़ से ज्यादा पैसेंजर्स को सफर कराके किया था। इंटरनेशनल मार्केट पर फोकस इंडिगो की नई रणनीति का सबसे बड़ा हिस्सा विदेशी बाजार हैं। कंपनी इंटरनेशनल कैपेसिटी शेयर को मौजूदा 30% से बढ़ाकर 40% करने जा रही है। इसके लिए एयरबस A321XLR और एयरबस A350 वाइडबॉडी विमानों को बेड़े में शामिल किया जा रहा है। चालू वित्त वर्ष में बेड़े में 9 नए A321XLR विमान शामिल होंगे। इससे एयरलाइन को लंबी दूरी के नए रूट्स जैसे एथेंस, इस्तांबुल, बाली और सियोल के लिए उड़ानें शुरू करने में मदद मिलेगी। भारत बनेगा ग्लोबल ट्रांजिट हब इंडिगो भारत को एक ऐसे ग्लोबल ट्रांजिट हब के रूप में देख रही है, जो यूरोप, साउथ-ईस्ट एशिया, मिडिल ईस्ट और अफ्रीका को आपस में जोड़ेगा। कंपनी का मानना है कि भारत की भौगोलिक स्थिति का फायदा उठाकर उन पैसेंजर्स को आकर्षित किया जा सकता है, जो अभी खाड़ी देशों (Gulf) और साउथ-ईस्ट एशिया के हब से होकर गुजरते हैं। प्रीमियम पैसेंजर्स के लिए 'स्ट्रेच बिजनेस-क्लास' कंपनी अपनी 'प्रीमियम रणनीति' पर भी तेजी से काम कर रही है। नए एयरबस A321XLR विमानों के बेड़े में स्पेशल बिजनेस-क्लास केबिन तैयार किए जाएंगे। इसमें यात्रियों को कंप्लीमेंट्री मील (मुफ्त खाना) और बेहतर ऑनबोर्ड सर्विसेज दी जाएंगी। इसके साथ ही, फ्यूल एफिशिएंसी बढ़ाने और ऑपरेटिंग खर्च को कम करने के लिए पुराने एयरबस A320 CEOs, A321 NEOs, बोइंग 737 और बोइंग 787 जैसे डैम्प-लीज्ड (दूरी पर लिए गए) विमानों को धीरे-धीरे बाहर किया जाएगा। शॉर्ट-टर्म चुनौतियां: मांग सुस्त होने से कैपेसिटी में कम बढ़ोतरी करेंगे लॉन्ग-टर्म के मजबूत लक्ष्यों के बावजूद, इंडिगो शॉर्ट-टर्म में सावधानी बरत रही है। मिडिल ईस्ट (पश्चिम एशिया) संकट के कारण हवाई यात्रा की मांग थोड़ी सुस्त पड़ी है। इसे देखते हुए कंपनी चालू वित्त वर्ष की पहली तिमाही में अपनी कैपेसिटी में केवल 3-4 फीसदी की ही बढ़ोतरी करेगी। बाजार में अनिश्चितता को देखते हुए मैनेजमेंट ने मापा-तौला रुख अपनाने की बात कही है। 2,536.9 करोड़ रुपए का शुद्ध घाटा और मिडिल ईस्ट रूट पर असर जियोपॉलिटिकल तनाव (भू-राजनीतिक संकट) के कारण इंडिगो को मिडिल ईस्ट और यूरोप की करीब 160 डेली फ्लाइट्स को री-रूट करके डोमेस्टिक ऑपरेशंस में लगाना पड़ा था। हालांकि, कंपनी ने दो-तिहाई कैपेसिटी बहाल कर ली है और जून के अंत तक यह पूरी तरह ठीक हो जाएगी। इस तिमाही में विमानन क्षेत्र की चुनौतियां साफ दिखीं। रुपए में तेज गिरावट के कारण कंपनी को 4,823 करोड़ रुपए का फॉरेन एक्सचेंज लॉस हुआ, जिससे Q4FY26 में 2,536.9 करोड़ रुपए का नेट लॉस (शुद्ध घाटा) दर्ज किया गया। एटीएफ (हवाई ईंधन) की ऊंची कीमतों और उड़ानों में रुकावट का असर भी कमाई पर पड़ा। रिस्क मैनेजमेंट: फॉरेक्स हेजिंग प्रोग्राम को $3 बिलियन किया करेंसी की अस्थिरता (रुपए के उतार-चढ़ाव) के जोखिम को कम करने के लिए इंडिगो ने अपने फॉरेन एक्सचेंज हेजिंग प्रोग्राम को 1 अरब डॉलर से बढ़ाकर 3 अरब डॉलर कर दिया है। हालांकि, शॉर्ट-टर्म की दिक्कतों के बावजूद कंपनी ने नए विमानों की डिलीवरी को टालने से साफ इनकार किया है। कंपनी अब धीरे-धीरे विमानों को खुद खरीदने और फाइनेंस लीजिंग मॉडल पर शिफ्ट हो रही है। क्या होती है फॉरेक्स हेजिंग और लीजिंग? फॉरेक्स हेजिंग: यह कंपनियों के लिए विदेशी मुद्रा में होने वाले नुकसान से बचने का एक बीमा जैसा है। डॉलर के मुकाबले रुपया गिरने पर जो नुकसान होता है, उसे कम करने के लिए पहले से ही एक फिक्स रेट पर एग्रीमेंट कर लिया जाता है। डैम्प-लीज: जब कोई एयरलाइन किसी दूसरी कंपनी से हवाई जहाज किराए पर लेती है, जिसमें विमान के साथ क्रू (चालक दल) या मेंटेनेंस में से कुछ चीजें ही शामिल होती हैं और बाकी खर्च खुद उठाना पड़ता है। अवेलेबल सीट किलोमीटर (ASK): यह एयरलाइन की पैसेंजर ले जाने की क्षमता को नापने का पैमाना है। जितनी सीटें उपलब्ध हैं, उन्हें कुल तय की गई दूरी (किलोमीटर) से गुणा करके इसकी गणना होती है।
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