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    इंटरनेशनल शूटर जसपाल राणा का मणिकर्णिका घाट पर अंतिम संस्कार:वाराणसी में बेटे ने मुखाग्नि दी, विधायक पंकज सिंह ने दिया कंधा

    20 hours ago

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    इंटरनेशनल शूटर जसपाल राणा पंचतत्व में विलीन हो गए। वाराणसी के मणिकर्णिका घाट पर उनका अंतिम संस्कार हुआ। बेटे युवराज सिंह राणा (21) ने मुखाग्नि दी। अंतिम यात्रा के दौरान रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह के बेटे विधायक पंकज सिंह और नीरज सिंह ने पार्थिव शरीर को कंधा दिया। पंकज सिंह, जसपाल राणा के बहनोई हैं। मणिकर्णिका घाट पहुंचने के बाद पार्थिव शरीर को गंगा स्नान कराया गया। इसके बाद गारद ने उन्हें अंतिम सलामी दी। इससे पहले शनिवार दोपहर करीब 3:52 बजे चार्टर विमान से जसपाल राणा का पार्थिव शरीर देहरादून से वाराणसी एयरपोर्ट पहुंचा। एयरपोर्ट के पुराने टर्मिनल भवन स्थित एयर कार्गो परिसर में पार्थिव शरीर को अंतिम दर्शन के लिए रखा गया, जहां बड़ी संख्या में लोगों ने श्रद्धांजलि दी। पंकज सिंह दोपहर करीब 12:15 बजे ही एयरपोर्ट पहुंच गए थे। पहले 4 तस्वीरें देखिए पद्मश्री जसपाल राणा के चाचा राजेंद्र राणा ने बताया- जसपाल राणा ने कई बार इच्छा जताई थी कि उनका अंतिम संस्कार मणिकर्णिका घाट पर किया जाए। इसी इच्छा को देखते हुए परिवार ने वाराणसी में अंतिम संस्कार का निर्णय लिया है। 49 साल के जसपाल राणा का शुक्रवार सुबह निधन हो गया था। वह पिछले 11 दिनों से दिल्ली के मैक्स साकेत अस्पताल में भर्ती थे। जर्मनी से लौटते समय फ्लाइट में उनकी तबीयत बिगड़ गई थी, जिसके बाद उन्हें अस्पताल में भर्ती कराया गया था। गुरु को अंतिम विदाई देते वक्त रो पड़ीं मनु भाकर ओलिंपिक मेडलिस्ट मनु भाकर शुक्रवार को ही अपने कोच जसपाल राणा को अंतिम विदाई देने देहरादून पहुंच गई थीं। कोच के पार्थिव शरीर को देख वह खुद को रोक नहीं पाईं और जसपाल राणा के पिता नारायण सिंह राणा से लिपटकर रो पड़ीं। मनु भाकर के करियर में जसपाल राणा की भूमिका बेहद अहम रही है। जूनियर स्तर से लेकर अंतरराष्ट्रीय मंच तक पहुंचाने में उन्होंने मनु को लगातार मार्गदर्शन दिया। पेरिस ओलिंपिक में मनु के दो पदकों के पीछे भी जसपाल राणा के प्रशिक्षण और अनुभव को बड़ी वजह माना जाता है। 600 से ज्यादा मेडल, 2006 एशियाड में रचा इतिहास जसपाल राणा भारतीय निशानेबाजी इतिहास के सबसे सफल खिलाड़ियों में गिने जाते हैं। विभिन्न राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में उनके नाम 600 से अधिक पदक दर्ज हैं। 1994 में मिलान में हुई जूनियर वर्ल्ड शूटिंग चैंपियनशिप में उन्होंने गोल्ड मेडल के साथ वर्ल्ड रिकॉर्ड बनाया था। उसी साल हिरोशिमा एशियन गेम्स में स्वर्ण पदक जीतकर उन्होंने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान बनाई। 2006 दोहा एशियन गेम्स उनके करियर का स्वर्णिम अध्याय माना जाता है। वहां उन्होंने 25 मीटर सेंटर फायर पिस्टल में 590 अंक का वर्ल्ड-इक्वलिंग स्कोर बनाया और तीन गोल्ड तथा एक सिल्वर मेडल जीता। राहुल गांधी से शूटिंग रेंज में शुरू हुई दोस्ती जसपाल राणा का रिश्ता सिर्फ खेल जगत तक सीमित नहीं था। उनकी राहुल गांधी के साथ साथ सीएम पुष्कर सिंह धामी के साथ ही व्यक्तिगत रिश्ते थे। कुछ परिवारिक सूत्रों की मानें तो राणा और कांग्रेस नेता राहुल गांधी की पहली मुलाकात भी शूटिंग रेंज में हुई थी। निशानेबाजी के साझा शौक ने दोनों को करीब लाया और बाद में राजनीति में आने के बाद भी यह रिश्ता बना रहा। 2012 में कांग्रेस में शामिल होने के बाद जसपाल राणा पार्टी के कार्यक्रमों में सक्रिय दिखे। राहुल गांधी के साथ उनकी कई मुलाकातें और सार्वजनिक कार्यक्रम चर्चा में रहे। उनके निधन पर राहुल गांधी ने भी शोक व्यक्त करते हुए भारतीय शूटिंग में उनके योगदान को याद किया। बीजेपी से कांग्रेस तक, पिता अलग दल में रहे खेल के बाद जसपाल राणा राजनीति में भी सक्रिय हुए। 2009 में वे बीजेपी के टिकट पर टिहरी लोकसभा सीट से चुनाव मैदान में उतरे, हालांकि जीत नहीं सके। बाद में उन्होंने कांग्रेस का दामन थाम लिया। उस समय उनके पिता नारायण सिंह राणा बीजेपी में सक्रिय थे, जबकि जसपाल कांग्रेस के लिए प्रचार कर रहे थे। पिता-पुत्र की अलग-अलग राजनीतिक राह उस दौर में उत्तराखंड की चर्चित राजनीतिक कहानियों में शामिल रही। राजनाथ सिंह परिवार से भी जुड़ा था रिश्ता जसपाल राणा की बहन सुषमा सिंह की शादी रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह के बेटे और नोएडा विधायक पंकज सिंह से हुई है। इस रिश्ते के चलते उनका परिवार देश की प्रमुख राजनीतिक हस्तियों से भी जुड़ा रहा। खेल, राजनीति और सामाजिक जीवन में सक्रिय रहने वाले जसपाल राणा अपने पीछे ऐसी विरासत छोड़ गए हैं, जिसमें मेडल, रिकॉर्ड, शिष्य और प्रेरणा की लंबी श्रृंखला शामिल है। पिता ITBP में रहे, बचपन में राणा को थमाई पिस्टल जसपाल राणा का जन्म 28 जून 1976 को उत्तरकाशी में हुआ था। हालांकि मूल रूप से वह टिहरी के रहने वाले थे। उनके पिता नारायण सिंह राणा इंडो-तिब्बत बॉर्डर पुलिस, यानी ITBP में तैनात थे। बाद में वे उत्तराखंड के पहले खेल मंत्री भी बने। शूटिंग के प्रति उनका विशेष लगाव था और उन्होंने ही बेटे को महज 10 साल की उम्र में पिस्टल पकड़ा दी थी। परिवार में खेल का माहौल इतना मजबूत था कि उनकी बहन सुषमा सिंह और भाई सुभाष राणा भी राष्ट्रीय स्तर के निशानेबाज बने। कम उम्र से ही जसपाल का अधिकांश समय शूटिंग रेंज में बीतने लगा और यहीं से उस सफर की शुरुआत हुई जिसने उन्हें दुनिया के सर्वश्रेष्ठ निशानेबाजों की कतार में खड़ा कर दिया। 12 साल की उम्र में पहला मेडल, 18 साल में अर्जुन पुरस्कार 1988 में अहमदाबाद में आयोजित राष्ट्रीय शूटिंग चैंपियनशिप में 12 साल के जसपाल राणा ने सिल्वर मेडल जीतकर देश का ध्यान अपनी ओर खींचा। इसके बाद उन्होंने लगातार राष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में शानदार प्रदर्शन किया और भारतीय शूटिंग का नया चेहरा बनकर उभरे। उनकी प्रतिभा का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि महज 18 साल की उम्र में उन्हें अर्जुन पुरस्कार से सम्मानित किया गया। उस दौर में इतनी कम उम्र में यह उपलब्धि हासिल करना अपने आप में बड़ी उपलब्धि मानी गई। -------------------------- ये खबर भी पढ़ें- 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