उत्तराखंड के शूटर जसपाल राणा का निधन:जर्मनी से लौटते वक्त फ्लाइट में तबीयत बिगड़ी; देहरादून लाया जा रहा पार्थिव शरीर
7 hours ago
पद्मश्री से सम्मानित उत्तराखंड के दिग्गज शूटर जसपाल राणा का शुक्रवार सुबह निधन हो गया। 49 वर्षीय राणा पिछले 11 दिनों से दिल्ली के मैक्स साकेत अस्पताल में भर्ती थे। जर्मनी से लौटते समय फ्लाइट में उनकी तबीयत बिगड़ गई थी। जसपाल राणा के पार्थिव शरीर को दिल्ली से बाय रोड देहरादून में उनके आवास में लाया जा रहा है। कॉमनवेल्थ और एशियन गेम्स में 23 पदक जीतने वाले राणा को भारतीय शूटिंग की सबसे बड़ी हस्तियों में गिना जाता है। उन्हें महज 18 साल की उम्र में अर्जुन पुरस्कार मिला था, जबकि बाद में पद्मश्री और द्रोणाचार्य पुरस्कार से भी सम्मानित किया गया। पेरिस ओलिंपिक में दो कांस्य पदक जीतने वाली मनु भाकर समेत कई अंतरराष्ट्रीय निशानेबाजों को तैयार करने वाले राणा के निधन पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह और मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने शोक जताया है। उनका पार्थिव शरीर आज शाम तक देहरादून स्थित उनके आवास लाया जाएगा। शनिवार को टिहरी जिले के पैतृक गांव भाल (चिलामू) में उनका अंतिम संस्कार किया जाएगा। तस्वीरें देखिए- पिता 1971 की लड़ाई के हीरो रहे, बचपन में राणा को थमाई पिस्टल जसपाल राणा का जन्म 28 जून 1976 को टिहरी में हुआ था। उनके पिता नारायण सिंह राणा इंडो-तिब्बत बॉर्डर पुलिस, यानी ITBP में तैनात थे। बाद में वे उत्तराखंड के पहले खेल मंत्री भी बने। शूटिंग के प्रति उनका विशेष लगाव था और उन्होंने ही बेटे को महज 10 साल की उम्र में पिस्टल पकड़ा दी थी। परिवार में खेल का माहौल इतना मजबूत था कि उनकी बहन सुषमा सिंह और भाई सुभाष राणा भी राष्ट्रीय स्तर के निशानेबाज बने। कम उम्र से ही जसपाल का अधिकांश समय शूटिंग रेंज में बीतने लगा और यहीं से उस सफर की शुरुआत हुई जिसने उन्हें दुनिया के सर्वश्रेष्ठ निशानेबाजों की कतार में खड़ा कर दिया। 12 साल की उम्र में पहला मेडल, 18 साल में अर्जुन पुरस्कार 1988 में अहमदाबाद में आयोजित राष्ट्रीय शूटिंग चैंपियनशिप में 12 साल के जसपाल राणा ने सिल्वर मेडल जीतकर देश का ध्यान अपनी ओर खींचा। इसके बाद उन्होंने लगातार राष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में शानदार प्रदर्शन किया और भारतीय शूटिंग का नया चेहरा बनकर उभरे। उनकी प्रतिभा का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि महज 18 साल की उम्र में उन्हें अर्जुन पुरस्कार से सम्मानित किया गया। उस दौर में इतनी कम उम्र में यह उपलब्धि हासिल करना अपने आप में बड़ी उपलब्धि मानी गई। दर्द में भी नहीं छोड़ी प्रतियोगिता, बनाया विश्व रिकॉर्ड जसपाल राणा के करियर की सबसे चर्चित उपलब्धियों में 1994 की विश्व शूटिंग चैंपियनशिप शामिल रही। प्रतियोगिता से ठीक पहले उनके घुटने में संक्रमण हो गया था। डॉक्टरों ने सर्जरी की सलाह दी और खेलने से मना किया, लेकिन उन्होंने मुकाबले में उतरने का फैसला किया। असहनीय दर्द के बावजूद उन्होंने जूनियर वर्ग की स्पर्धा में हिस्सा लिया और विश्व रिकॉर्ड स्कोर के साथ गोल्ड मेडल जीत लिया। इसी साल हिरोशिमा एशियन गेम्स में भी उन्होंने स्वर्ण पदक हासिल कर अंतरराष्ट्रीय मंच पर भारत की मजबूत मौजूदगी दर्ज कराई। कॉमनवेल्थ के सबसे सफल भारतीय खिलाड़ी बने जसपाल राणा का नाम कॉमनवेल्थ खेलों के इतिहास में भारत के सबसे सफल खिलाड़ियों में दर्ज है। उन्होंने 1994 से 2006 के बीच चार कॉमनवेल्थ गेम्स में कुल 15 मेडल जीते, जिनमें 9 गोल्ड शामिल हैं। एशियन गेम्स में भी उनका दबदबा कायम रहा। उन्होंने चार गोल्ड, दो सिलवर और दो ब्रॉन्ज समेत कुल 8 पदक जीते। 2006 दोहा एशियन गेम्स में उन्होंने 25 मीटर सेंटर फायर पिस्टल स्पर्धा में विश्व रिकॉर्ड की बराबरी करते हुए गोल्ड मेडल अपने नाम किया। मनु भाकर समेत नई पीढ़ी के चैंपियन तैयार किए प्रतियोगी शूटिंग से दूरी बनाने के बाद जसपाल राणा ने अपना पूरा समय युवा खिलाड़ियों को तैयार करने में लगाया। देहरादून में स्थापित अपनी शूटिंग अकादमी के जरिए उन्होंने कई अंतरराष्ट्रीय स्तर के निशानेबाज तैयार किए। पेरिस ओलिंपिक में दो कांस्य पदक जीतने वाली मनु भाकर उनकी सबसे चर्चित शिष्या रहीं। 2023 में दोनों फिर साथ आए और उसके बाद मनु ने ओलिंपिक इतिहास रच दिया। मनु ने कई बार सार्वजनिक रूप से अपनी सफलता का श्रेय जसपाल राणा को दिया। राजनीति में भी आजमाई किस्मत, लेकिन खेल से रिश्ता नहीं टूटा 2006 एशियन गेम्स के बाद जसपाल राणा भारतीय जनता पार्टी से जुड़े और 2009 में टिहरी लोकसभा सीट से चुनाव लड़ा। हालांकि उन्हें जीत नहीं मिली। बाद में वे कांग्रेस में शामिल हो गए और उत्तराखंड की राजनीति में सक्रिय रहे। राजनीतिक गतिविधियों के बावजूद उनका मुख्य फोकस हमेशा शूटिंग और खिलाड़ियों को तैयार करना ही रहा। खेल उपकरणों पर टैक्स कम कराने जैसे मुद्दों पर भी वे लगातार आवाज उठाते रहे। नरेंद्र नेगी के गीत में अमर हुआ उत्तराखंड का निशानेबाज 1990 के दशक में जब जसपाल राणा लगातार अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में भारत के लिए पदक जीत रहे थे, तब उनकी उपलब्धियों की गूंज उत्तराखंड के लोकसंगीत तक पहुंच गई थी। गढ़रत्न नरेंद्र सिंह नेगी ने उन पर 1999 में प्रसिद्ध गीत 'बन्दूक्या जसपाल राणा' रचा, जिसने उन्हें पहाड़ के घर-घर तक पहुंचा दिया। ----------------------- ये खबर भी पढ़ें…. कोच के निधन की खबर सुनकर मनु ने मैच रोका:हाथ से पिस्टल छूटी, जमीन पर बैठीं; फोन पर जसपाल ने कहा था- अब तबीयत में सुधार ओलिंपियन मेडलिस्ट शूटर मनु भाकर के कोच जसपाल राणा का 49 साल की उम्र में निधन हो गया। कोच के निधन की खबर सुनते ही मनु भाकर के हाथ से पिस्टल छूट गई। कुछ पल के मनु एक जगह ही खड़ी रहीं। (पढ़ें पूरी खबर)
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